क्यों हमेशा bollywood celebs पर दाव लगते है राजनैतिक दल

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विद्या बालन ने कहा है की फिल्में बस 3 चीजों की वजह से चलती हैं “etertainment,entertainment and entertainment”. वैसा ही कुछ अब इंडियन पॉलिटिक्स में भी होने लगा है. आप देख सकते है कैसे कुछ सालों पहले राखी सावंत ने अपनी पार्टी बनाई थी और चर्चा में रही थी वैसे ही राहुल गाँधी के भाषणों ने हमे कम एंटरटेन नहीं किया है.

वैसे अपने देखा होगा आज कल चुनाव के इस मौसम में राजनीति में आए दिन तमाम क्षेत्रों की शख्सियतें उतर रही हैं। बुधवार को जहां उर्मिला मातोंडकर ने कांग्रेस का हाथ थामा, वहीं चंद रोज पहले क्रिकेटर गौतम गंभीर बीजेपी में शामिल हुए। राजनीति में खेल, ग्लैमर और फिल्म industry से लोगों का आना कोई नहीं बात नहीं है।
विभिन्न दल जीत की उम्मीद में सिलेब्रिटीज और ग्लैमर वर्ल्ड के लोगों को उतारते रहे हैं। स्पोर्ट्स और फिल्म industry से हस्तियों को राजनीति में उतारने की शुरुआत तो काफी पहले हो चुकी थी, लेकिन इस ट्रेंड में तेजी अस्सी के दशक से आना शुरू हुई, जो लगातार बढ़ती ही गई।
जहां ज्यादातर सिलेब्रिटीज राजनीति में आकर थोड़ा समय बिताकर अपनी दुनिया में वापस लौट गए, वहीं कुछ हस्तियां ऐसी भी रहीं हैं जो राजनीति में उतरने के बाद यहीं की होकर रह गईं।

इनमें से कई मंत्री पदों तक पहुंचे तो कुछ राज्यों के मुख्य मंत्री पदों तक पहुंची। इनमें सबसे चर्चित नाम तेलगु फिल्मों के हीरो एनटी रामाराव, तमिल फिल्मों के हीरो एमजी रामचंद्रन और जयललिता का है। यूं तो अपने यहां तमाम क्षेत्रों से सिलेब्रिटीज आए, लेकिन इनमें सबसे अधिक बोलबाला फिल्मी कलाकारों और क्रिकेटर्स का रहा। उसकी एक बड़ी वजह अपने यहां इन दोनों के प्रति लोगों का क्रेज है।
राजनैतिक दलों द्वारा सिलेब्रिटीज पर दांव लगाने की वजह समाज में उनके ग्लैमर और क्रेज को catch कराना है। दरअसल, इन लोगों की अपनी फैन फाॅलोइंग होती है और लोग उन्हें नजदीक से देखना, सुनना और पास आना चाहते हैं.

राजनैतिक दल लोगों की इसी मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए उन्हें मौका देते हैं। राजनैतिक दल इन सिलेब्रिटीज का दो तरह से इस्तेमाल करते हैं। कई बार वह अपने दल के प्रचार के लिए इन सिलेब्रिटीज का इस्तेमाल करते हैं तो ज्यादातर मौकों पर इन्हें चुनाव में उतारा जाता है।

यूं ताे तमाम दल इन सिलेब्रिटीज को मौका देते रहे हैं, लेकिन इनमें सबसे आगे कांग्रेस दिखाई देती रही है। लेकिन अब हर पोलिटिकल पार्टीज इसको आजमा रही है .
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर में इसमें काफी तेजी दिखाई दी। इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी ने दिग्गज राजनीतिज्ञों के सामने सिलेब्रिटीज को उतारा।
आपको बता दें की 1984 में राजीव गांधी ने जहां इलाहाबाद में दिग्गज नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के सामने सुपरस्टार और अपने बचपन के दोस्त अभिताभ बच्चन को उतारा, बहुगुणा ऐसा हारे कि उसके बाद वह बैकग्राउंड में चले गए। वहीं, उन्होंने तमिलनाडु में जानी मानी ऐक्ट्रेस वैजंयती माला को भी मौका दिया।

1991 में रथयात्रा के बाद बीजेपी के सीनियर नेता एल के आडवाणी का का क्रेज हाइट्स पर था तो कांग्रेस ने राजेश खन्ना को नई दिल्ली से आडवाणी के सामने से उतार दिया। आडवाणी महज 1500 वोटों से भले ही जीत गए हों, लेकिन नई दिल्ली से उनकी विदाई हो गई और तब से उन्हें गुजरात से ही लड़ना पड़ा। इसके बाद नई दिल्ली में हुए उपचुनाव में राजेश खन्ना ने फिल्मी जगत से बीजेपी में आए शत्रुघ्न सिन्हा को हराया।

वैसे हम आपको बता दें की आज भी कई ऐसी हस्तियाँ है जिन्होंने अपना फिल्मों के बाद राजनीति में भी अपनी एक अलग पहचान बनी है .
सुनील दत्त ,जय ललिता , राजेश खन्ना , विनोद खन्ना जैसे पर्सनालिटी ने फिल्मों के तरह राजनीति में भी अपने नाम का बोलबाला रखा. इसलिए तो आज भी लोग उनको एक अच्छे नेता के तौर पर याद करते है .
वहीं शत्रुघ्न सिन्हा , गोविंदा , जय प्रदा , हेमा मलिन जैसे bollywood celebs भी as a पॉलिटिशियन काफी नाम बटोर रहे है.
फिल्में समाज का आयना होती है. bollywood से हमारे र समाज का एक अलग ही रिश्ता है. लोग फिल्मों को देखते नहीं जीतें है . इसीलिए तो रजनीकांत की पूजा करते है लोग.
खैर अगर filmi पर्दें पर नायक लोगों को इतना प्रभावित करते है इसलिए तो पोलिटिकल पार्टीज इन पर दाओ लागते है